कोटा मठ में महंत देवानंद हत्याकांड: 345 बीघा जमीन और संपत्ति विवाद से जुड़ी साजिश का खुलासा

कोटा मठ में महंत देवानंद हत्याकांड: 345 बीघा जमीन और संपत्ति विवाद से जुड़ी साजिश का खुलासा

Mahant Devanand murder case at Kota Math

Mahant Devanand murder case at Kota Math

जयपुर। Mahant Devanand murder case at Kota Math, राजस्थान के कोटा जिले के ऐतिहासिक चंद्रेसल गांव के मठ के भीतर बीते 5 जून को महंत देवानंद महाराज की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। पुलिस जांच में इस हत्या के पीछे चौंकाने वाली साजिश सामने आई है।

पुलिस जांच में सामने आया है कि पुजारी के हत्या के पीछे की वजह करीब 10वीं सदी पुराने मठ, उसकी करोड़ों की संपत्ति और 345 बीघा जमीन पर कब्जे की लड़ाई हो सकती है।

दरअसल, कोटा में चंद्रसाल मठ के मुख्य पुजारी देवानंद महाराज की हत्या इस समय चर्चा में है। 5 जून को हुई पुजारी देवानंद की हत्या मामले में अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें एक अन्य मठ पुजारी नंदन बन और कोटा के वकील संतोष कुमार राय शामिल हैं।

26 बार चाकू से हमला

पुजारी देवानंद महाराज के ऊपर 26 बार चाकू से हमला किया गया था। इस पूरे विवाद में जाति, धर्म, सत्ता और पैसे का जटिल खेल भी शामिल बताया जा रहा है। जांचकर्ताओं और ट्रस्ट के सदस्यों का कहना है कि पुजारी देवानंद और संतोष राय के बीच विवाद बढ़ता जा रहा था। जिन्होंने मंदिर और उसकी संपत्तियों को नियंत्रित करने वाले मठ निकाय में नामांकन को लेकर एक नागरिक विवाद में ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व किया था।

मामले की जांच कर रहे बोरखेड़ा पुलिस स्टेशन के थाना अधिकारी अनिल टेलर के अनुसार, हत्या को अंजाम देने के लिए एक नाबालिग सहित चार लोगों को पैसे देकर बुलाया गया था।

2018 में छोड़ दिया था घर

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के राजवाना गांव में पैदा हुए देव शंकर पोसवाल का विवाह 2006 में 15 वर्ष की आयु में हुआ था। देवानंद ने 2018 में घर छोड़ दिया और संसार का त्याग कर दिया। इसके बाद वह चंद्रसाल मठ के नाम से जाने जाने वाले दशनाम संन्यासी संप्रदाय के अंतर्गत आने वाले जूना अखाड़ा से जुड़े गए।

इस पारंपरिक रूप से वर्जित स्थानांतरण के कारण चंद्रसाल महादेव मंदिर ट्रस्ट में गंभीर मतभेद पैदा हो गए। सांप्रदायिक विवाद के साथ यहां जातिगत तनाव भी बढ़ गया। जहां न्यासियों के एक वर्ग ने देवानंद पर गुर्जर समुदाय का पक्षपात करने का आरोप लगाया। न्यास के एक सदस्य ने कहा कि गुर्जर चाहते थे कि देवानंद मठ का कार्यभार संभालें ताकि भूमि पर उनका अधिकार सुरक्षित रहे।

जमीन का इतिहास आधी सदी पुराना

लेकिन साल 2024 में तब विवाद और बढ़ गया जब देवानंद ने मंदिर की विवादित भूमि पर अपनी सत्ता मजबूत करनी शुरू की। इस पूरे विवाद के केंद्र में मंदिर की 345 बीघा (215 एकड़) जमीन है, जिसका इतिहास आधी सदी पुराना है, जब तत्कालीन महंत शरवन बन द्वारा मंदिर की 500 बीघा जमीन बेचने के फैसले के बाद, ग्रामीणों ने 1998 में कानूनी लड़ाई लड़कर 345 बीघा जमीन वापस पाने के लिए मुकदमा किया था।

इसके बाद 2003 में एक सरकारी ट्रस्ट पंजीकृत हुआ, जिससे नियंत्रण महंत के हाथ से निकल गया। साल 2016 में कोर्ट ने इस संपत्ति को मठ परिवार की बताया, लेकिन अंतिम फैसले तक एक रिसीवर नियुक्त कर दिया।

इस मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि 345 बीघा में से 270 बीघा कृषि भूमि थी, जिसकी हर साल तहसीलदार द्वारा नीलामी की जाएगी और उससे प्राप्त धन बैंक खाते में जमा किया जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे यह राशि अब 4 करोड़ रुपये हो गई है। यह धन भी विवाद का विषय बन गया है।